जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्रमा का युति संबंध बनता है, अर्थात किसी भी भाव में ये दोनों ग्रह एक साथ बैठते है तो जन्म कुण्डली में ‘‘ विष योग’’ का निर्माण होता है, और व्यक्ति के जीवन में जब-जब इन दोनों ग्रहों की महादषा या अन्तर दषा या प्रत्यन्तर दषा चलती है, तब -तब जीवन में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है, एवं अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं, एवं अनेक कार्याे में बाधाएं उत्पन्न होती है, परन्तु शास्त्रों के अनुसार यदि उपाय किए जाये तो इस ‘विष योग’ के अषुभ फलों को कम किया जा सकता है।

  1. पीपल के पेड़ के नीचे एक पानी वाला नारियल सिर से सात बार उतार कर फोड़ दे, और नारियल को प्रसाद के रूप में बॉट दें।
  2. शनिवार के दिन या शनि अमावस्या के दिन संध्या काल सूर्यास्त के पश्चात् श्री शनि देव की प्रतिमा पर या षिला पर तेल चढ़ाए, एक दीपक सरसो के तेल को जलाए दीपक में थोड़ा काला तिल एवं थोड़ा काला उड़द डाल दें। इसके पश्चात् 10 आक के पत्ते (अकवन) ले और काजल पर थोड़ी सरसो का तेल मिलाकर स्याही बना ले, और लोहे की कील के माध्यम से प्रत्येक पत्ते में नीचे लिखे मंत्र को लिखे उदाहरण – जैसे 1. ऊॅ, 2. शं, 3. श, 4. नै, 5. श् (आधा श् शंकरवाला) 6. च, 7. रा, 8. यै, 9. न, 10. मः इस प्रकार 10 पत्तो में 10 अक्षर हो जाते है, फिर इन पत्तो को काले धागे में माला का रूप देकर, श्री शनि देव की प्रतिमा या षिला में चढ़ाये। इस क्रिया को करते समय मन ही मन शनि मंत्र का जाप करते रहे।
  3. गुड़, गुड़ की रेवड़ी, तिल के लड्डू, शनि मंदिर में प्रसाद चढ़ाये और प्रसाद को बॉट दे। तथा गाय, कुत्ते, एवं कौओ को भी खिलाए।
  4. शनि मंदिर में या हनुमान जी के मंदिर में घड़ा में पानी भरकर दान करें।
  5. पूर्णिमा के दिन षिव मंदिर में रूद्राभिषेक करवाये।
  6. प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से कम से कम 5 माला महामृत्युन्जय मंत्र का जाप करे, इस क्रिया को शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरम्भ करें।
  7. माता एवं पिता अपने से उम्र में जो अधिक हो अर्थात पिता माता समान हो उनका चरण छूकर आर्षीवाद ले।
  8. शनिवार के दिन कुए में दूध चढ़ाये।
  9. श्री सुन्दर कांड का 49 पाठ करें। किसी हनुमान जी के मंदिर में या पूजा स्थान में शुद्ध घी का दीपक जलाकर पाठ करें, पाठ प्रारम्भ करने के पूर्व अपने गुरू एवं श्री हनुमान जी का आवाहन अवष्य करें।
  10. श्री हनुमान जी को शुद्ध घी एवं सिन्दूर का चोला चढ़ाये श्री हनुमान जी के दाहिने पैर का सिन्दूर अपने माथे में लगाए।