पित्र या पिता का भाव, जन्म कुण्डली का नवम भाव बेहद जन्म कुण्डली में पित्र दोष
पित्र या पिता का भाव, जन्म कुण्डली का नवम भाव बेहद महत्व पूर्ण भाव होता है। यह भाव जहां पिता के सुख, आयु व समृद्वि का कारक है, वही यह भाव जातक के स्वयं के भाग्य, जीवन मंे अनेक प्रकार से उन्नति एवं अध्यात्म के क्षेत्र में जातक कितनी रूचि रखता है, यह भी देखा जाता है।
सूर्य पिता का कारक ग्रह होता है, वही सूर्य जातक के जीवन में विषेष शुभफल भी देता है। उसके जीवन में जो भी उन्नति होती है, यह सूर्य की कृपा से ही होती है। यदि ऐसी स्थिति में जातक की जन्म कुण्डली में सूर्य राहू के साथ युति संबंध बन जाए तो ग्रहण योग बन जाता है। अर्थात सूर्य राहू एक साथ हो जाये तो जातक के पिता को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है, और जातक के भाग्य में भी बाधा आती है, और जातक को उसके कार्य क्षेत्र में अनेक रूकावटे बाधाएं आती है। जब सूर्य और राहू जन्म कण्डली में एक साथ होकर नवम भाव में ग्रहण योग बनाते है। तो इस योग के साथ पित्र दोष भी बनता है।
वैसे भी सूर्य और राहू की युति अर्थात ग्रहण योग जिस भाव मं बनता है , उस भाव के प्रभाव के शुुभ फलों को नष्ट कर देता है, और जातक की उन्नति में हमेषा बाधा बनी रहती है। विषेष कर यदि चौथा भाव, पांचवा भाव और दषम भाव एवं पहले भाव अर्थात लग्न मेें हो तो जातक का सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहता है। सूर्य प्रगति और प्रसिद्व का कारक है , और राहू केतु की छाया प्रगति को रोक देती है। अतः यह युति किसी भाव में हो तो समस्या ही पैदा होती है।
चन्द्र राषि के नवम्भाव एवं नवम्भाव के स्वामी यदि राहू और केतु से ग्रसित है, पीड़ित है तो यह पित्रदोष कहा जाता है जिस व्यक्ति के जन्म कुण्डली में इस प्रकार का अषुभ योग निर्मित हो जाता है, उसके जीवन में अनेक समस्आएं बनी रहती है जैसे षिक्षा का न हो पाना , व्यापार मंे असफल होना , नौकरी न मिलना जीविका के लिए अत्यधिक परेषान होना , मानसिक तनाव रहना , शरीर अपंग होना , जीवन में अषांति रहना , अस्वस्थ्य रहना , कर्ज होना आदि।