पिता के मृत्यु के पष्चात संतान अपने पिता का श्राद्व नही करते है, एवं जब पिता जीवित हो तो उनका सम्मान नही करते , जब जातक का दूसरा जन्म होता है तो ऐसे जातक को पित्र दोष लगता है, सर्प हत्या, या किसी निर्दोष की हत्या से भी पित्र दोष लगता है। इसे दोष के लगने से व्यक्ति का जीवन दुखो से भर जाता है।

  1. सूर्य को ग्रहों में पिता का कारक ग्रह माना जाता है, और राहू को छाया ग्रह माना जाता है। जब राहू सूर्य के साथ युति संबंध बनाता है, तो सूर्य को ग्रहण लगता है।
  2. इस प्रकार सूर्य और राहू नवम् भाव में युति संबंध बनाते है तो पित्र दोष बनता है।
  3. जन्म कुण्डली में सूर्य, चन्द्र और राहू किसी भाव में युति बनाते है तो पित्र दोष बनता है।
  4. चन्द्र या सूर्य लग्न के स्वामी हो और अपनी नीच राषि में हो अर्थात चन्द्र वृष्चिक राषि में हो और सूर्य तुला राषि में हो और लग्न में या चन्द्र, सूर्य के साथ युति या दृष्टि संबंध बनाते हो और उन ग्रहों पर पापी ग्रहो का प्रभाव हो तो पित्र दोष लगता है।
  5. लग्न व लग्नेष निर्बल हो और नीच लग्नेष के साथ राहू और शनि की युति संबंध या दृष्टि संबंध हो तो पित्र दोष लगता है।
  6. लग्न में गुरू नीच का हो अर्थात मकर राषि में हो और गुरू के ऊपर किसी पापी ग्रह का किसी प्रकार का प्रभाव पड़ता हो अथवा त्रिक भाव के स्वामी गुरू से युति या दृष्टि संबंध बनाते हो तो पित्र दोष बनता है, ऐसे जातक को उसके पितर कष्ट देते हैं।
  7. नवम भाव में बृहस्पति और शुक्र की युति हो एवं दसम भाव में चन्द्र पर शनि व केतू का प्रभाव हो तो पित्र दोष बनता है।
  8. शुक्र यदि राहू शनि और मंगल द्वारा पीड़ित हो तो इसे भी पित्र दोष मानना चाहिए।
  9. अष्टम भाव में सूर्य पंचम में शनि हो तथा पंचम भाव का स्वामी राहू से युति संबंध बनाता हो और लग्न में पापी ग्रहो का प्रभाव हो तो पित्र दोष लगता है।
  10. पंचम या नवम भाव में कोई पापी ग्रह हो या फिर पंचम भाव में सिंह राषि हो अर्थात मेष लग्न की कुण्डली हो और पंचम भाव का स्वामी सूर्य किसी पापी ग्रहसे युति या दृष्टि संबंध बनाता हो तो पित्र दोष से जातक पीड़ित होता है।
  11. जन्म कुण्डली में द्वितीय भाव, नवम भाव, एवं द्वादस भाव पर या इन भावों या निर्बल हो और उन पर केतू का प्रभाव हो तो पित्रदोष बनता है।
  12. जन्म कुण्डली में दसम भाव का स्वामी त्रिक भाव में होता है, और गुरू पापी ग्रहो के साथ स्थिति होता है, एवं लग्न एवं पंचम भाव पर पापी ग्रहो का प्रभाव हो तो पित्र दोष बनता है।