परम्परागत ज्योतिष (Traditional astrology) में लग्न राशि, भाव, भावेश तथा कारकतत्वों को ध्यान में रखते हुए फलादेश (Predictions) किया जाता है. लग्न में स्थित राशि की विशेषताओं के अनुसार लग्न भाव अर्थात व्यक्ति के शरीर का विचार किया जाता है. लग्न पर किसी प्रकार का कोई अशुभ प्रभाव होने पर शारीरिक क्षमता (physical capacity) प्रभावित होती है. लग्न भाव में जो ग्रह स्थित होते हैं उसका प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव पर पड़ता है, ऐसा माना जाता है. लग्न में स्थित राशि का जो भी ग्रह स्वामी होता है उसके गुण भी व्यक्ति के स्वभाव में देखे जाते हैं. शेष भावों का विश्लेषण भी ठीक इसी प्रकर किया जाता है.

परम्परागत ज्योतिष की यह भी मान्यता है कि भाव और भावेश को देख रहे कारकतत्व भी व्यक्ति को मिलने वाले फलों पर प्रभाव डालते हैं. कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) कुछ बातों में पारम्परिक ज्योतिष के समान है लेकिन, कई बातों में कृष्ण्मूर्ति पद्धति पारम्परिक ज्योतिष से भिन्न भी है. आइये देखें कि दोनों ज्योतिष पद्धति में क्या समानता है और क्या असमानता.

1. लग्न में स्थित राशि: (Signs are Located in the Ascendant)

समानताएं : (Similarities)
लग्न में स्थित राशि के विषय पर दोनों पद्धतियां में यह समानता है कि दोनों ही राशियों की मूल विशेषताओं को समान रूप से स्वीकार करते हैं. जैसे:- मेष राशि पर मंगल का स्वामित्व है यह दोनों पद्धतियों में मान्य है. मेष राशि की विशेषताएं तथा मंगल ग्रह की विशेषताएं अर्थात बल, साहस, जोश इत्यादि पर दानों ही एक मत हैं. कृष्णमूर्ति पद्धति को जन्म कुण्डली व प्रश्न लग्न के रुप में प्रयोग किया जाता है.

विषमताएं :(Differences)
परम्परागत ज्योतिष में जहां लग्न में स्थित राशि को महत्व दिया जाता है. वही कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में लग्न जिस नक्षत्र में स्थित हों तथा नक्षत्र का जो स्वामी हो उसे महत्व दिया जाता है. नक्षत्र स्वामी को अधिक महत्व देने का कारण इस पद्धति में कारकतत्वों के स्थान पर कार्येश (घटना को घटित करने वाला ग्रह) का विश्लेषण करते हुए फलादेश करने का प्रयास किया जाता है. कार्येश जिन राशियों में जिन नक्षत्रों व जिन ग्रहों से दृष्ट होता है. उन्हीं के अनुसार घटना के घटित होने की संभावना रहती है.

2. भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्रों के ग्रह:-(Planets of Nakshatras of Planets are Located in the Houses)

समानताएं :- (Similarities)
ये दोनों ही पद्धतियां नक्षत्रों पर आधारित है. पराशरी ज्योतिष भी जन्म नक्षत्र पर आधारित पद्धति है. इसमें जन्म नक्षत्र के अंशों के अनुसार ही जन्म समय के बाद की दशा आरम्भ होती है. इसी प्रकार कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्र व नक्षत्र स्वामियों को अधिक महत्व दिया गया है. कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में नक्षत्र स्वामी ग्रह महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है. दोनों में ही नक्षत्रों के गुण धर्म का प्रयोग नहीं किया जाता है. ग्रहों की तरह नक्षत्रों की भी अपनी विशेषताएं होती है. जिनका उल्लेख इस पद्धति में कहीं नजर नहीं आता है. इसलिये दोनों पद्धतियों को नक्षत्र आधारित पद्धति कहा जा सकता है.

विषमताएं: (Differences)
कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्र के स्वामी को विशेष महत्व दिया जाता है. इसमें देखा जाता है कि किसी भाव में जो ग्रह स्थित है, वह किस ग्रह के नक्षत्र में है तथा उस ग्रह के अन्य नक्षत्रों पर किन ग्रहों का अधिकार है. पराशरी ज्योतिष में इन बातों को शामिल नहीं किया गया है. समय का सूक्ष्म निरीक्षण करने के लिये कृष्णमूर्ति का यह नियम बहुत ही उपयोगी है. इससे फलदेश घटना के अत्यन्त निकट होता है.

3. निरायन भाव आधारित कुण्डली:- (Horoscope Based on the Nirayan House)

समानताएं :- (Similarities)
दोनो ही पद्धतियों में कुण्डली के भावों के नाम व भावों की सामान्य विशेषताएं समान है. जैसे: तीसरे घर को पराक्रम, आवागमन, यातायात, यात्रा, लेखन आदि का घर कहा जाता है. भावों की यह विशेषताएं दोनों ही पद्धतियों में समान रुप से स्वीकार की जाती हैं.

विषमताएं:- (Inequalities)
कृष्णमूर्ति पद्धति में भाव मध्य को आधार बनाकर कुण्डली तैयार की जाती है. इस प्रणाली में किस भाव का कौन सा अधिपति है. यह देखने के स्थान पर भाव स्थित ग्रह के नक्षत्र स्वामी को देखा जाता है. नक्षत्र के स्वामी की राशियों पर कौन से ग्रहों का अधिकार है तथा वे ग्रह किन नक्षत्रों में है यह देखा जाता है. परम्परागत ज्योतिष पद्धति में इस नियम को आधार बनाकर कुण्डली तैयार नहीं की जाती है. परम्परागत ज्योतिष में नक्षत्रों के अधिपतियों को भी अधिक महत्व नहीं दिया जाता है.

4.कृष्णमूर्ति पद्धति में कोई ग्रह शुभ या अशुभ नहीं:- (Auspicious and Inauspicious Planets in the Krishnamurthy System)

कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में शुभ, अशुभ, उंच, नीच को नहीं माना जाता है. इस पद्धति में जो ग्रह कार्येश बनता है. वह महत्वपूर्ण होता है. तथा घटना के घटित होने में वहीं ग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. शेष ग्रह षडबल में बली होकर भी बली नहीं माने जाते है. परन्तु परम्परागत ज्योतिष पद्धति में भावों में बली ग्रह ही फल देने में समर्थ होता है. ग्रह के शुभ होने पर शुभ फल व अशुभ होने पर इसके विपरीत फल प्राप्त होते है.

5.संख्यात्मक पद्धति का प्रयोग :- (Use of Numeric System)

कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में हर नक्षत्र को नौ भावों में विभाजित किया जाता है. इस प्रकार 27 नक्षत्रों के 249 भाग किये जाते है. सूक्ष्म फलादेश करने में इनका प्रयोग किया जाता है. इसके विपरित परम्परागत ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा के नौ भाग किये जाते है. जिसके फलस्वरुप अन्तर्दशा ज्ञात की जाती है. कृष्णमूर्ति पद्धति आधुनिक ज्योतिष में एक नवीन प्रयोग के समान है. जिसमें नये अनुभवों में वृद्धि हो रही है.

6. घटना से संबन्धित उपनक्षत्र स्वामी का प्रयोग:- (Usage of Upnakshatra Lord Related to an Incident)

कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में किसी भी घटना को जानने के लिये एक ही सामान्य नियम का प्रयोग किया जाता है. जिसमें घटना से संबन्धित प्रमुख भाव का उपनक्षत्र स्वामी उस भाव की घटनाओं का कारक होता है. इन घटनाओं से संबन्धित प्रश्नों के उतर जानने के लिये उपनक्षत्र व कार्येश का ही विश्लेषण किया जाता है.

7.कालनिर्णय ज्ञात करना:- (Identification of Kaala Nirnayana)

कालनिर्णय अर्थात घटना कब होगी, यह जानने के लिये विंशोतरी महादशा का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार परम्परागत पद्धति व कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) दोनों में ही विंशोतरी महादशा प्रयोग की जाती है.

8.प्रश्न कुण्डली :- (Prashna Kundali)

प्राचीन हिंदू ज्योतिष में अचानक से होने वाली घटनाओं को जानने के लिये प्रश्न कुण्डली का प्रयोग किया जाता है. कई बार प्रश्न कुण्डली में एक साथ कई प्रश्न किये जाने पर फलादेश करते समय दिक्कतें आने की गुंजाइश रहती है. कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में 1 से 249 के मध्य की कोई भी संख्या जान कर इस प्रकार की परेशानियों को हल करने की व्यस्था है. प्रश्नकर्ता के द्वारा बताई गई संख्या से प्रश्न कुण्डली का लग्न निर्धारित होता है. जिससे प्राप्त होने वाले फल आमतौर पर सही माने जाते हैं. कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में यह एक नया प्रयोग है.

9.तत्कालीन कार्येश ग्रह:- (Immediate Planet of the 10th House)

तत्कालीन कार्येश से अभिप्राय प्रश्न समय में जो लग्न उदित हुआ हो उस लग्न का स्वामी कार्येश हो
सकता है या फिर चन्द्र जिस नक्षत्र में हो उस नक्षत्र का स्वामी कार्येश हो सकता है अथवा चन्द्र जिस राशि में स्थित हो उस राशि का स्वामी भी कार्येश हो सकता है. प्रश्न करते समय जो वार हो उस वार का स्वामी भी कार्येश बन सकता है. इन सभी में से कोई एक जो घटित होने वाली घटना से सबसे अधिक जुड़ा हो वह कार्येश बनने की योग्यता रखता है.

10.व्यक्ति के जन्म समय की शुद्धि करना:-(Rectification of the Birth-time of a Person)

कृष्णमूर्ति पद्धति (Krishnamurti Paddhati) में संधि लग्न पर स्थित राशियां ज्ञात की जाती है. भाव संधि से ग्रह का सही भाव ज्ञात किया जाता है. संम्बन्धित घटना किस दशा- अन्तर्दशा व विदिशा में होगी यह ज्ञात किया जा सकता है. घटना का समय निकालने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है. इस आधार पर ही व्यक्ति के जन्म समय का शुद्धिकरण किया जा सकता है.

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सूर्य एवं कृष्णमूर्ति पद्धति

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शुक्र एवं कृष्णमूर्ति पद्धति

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राहु एवं कृष्णमूर्ति पद्धति

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