शनि देव को नवग्रहों में प्रमुख स्थान दिया गया है. इनकी मंद गति के कारण व्यक्ति पर इनका प्रभाव दीर्घकाल तक बना रहता है. भगवान शंकर ने शनि देव को दंडाधिकारी का पद दिया है. यही कारण है कि इनके हाथों में दण्ड होता है. अपने दण्ड से शनि देव जीवों को सद्कर्म तथा न्याय की राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं. शनि अपने गुणों के कारण सदैव पूजनीय हैं. कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति (Krishnamurthy astrology system) में इनकी जिन विशेषताओं का वर्णन किया गया है उनका जिक्र यहां प्रस्तुत किया गया है.

शनि की विशेषताएं: (Specialities of Saturn as per KP System)

सभी ग्रहों में शनि की गति मन्द होने के कारण इनका प्रभाव लम्बे समय तक बना रहता है. ग्रहों में इन्हें दंडाधिकारी अर्थात न्यायकर्ता का स्थान प्राप्त है. यह सभी ग्रहों में समय के कारक भी माने जाते हैं. शनि का गुण है कि इनका फल विलम्ब से प्राप्त होता है. इनसे मिलने वाले फल रुक-रुक कर प्राप्त होते है. शनि देव बाधक ग्रह के रुप में भी जाने जाते है. इसलिये शनि देव का प्रभाव जिन भावों पर पड़ता है. उन भावों के फलों की प्राप्ति में बाधाएं आने की संभावना रहती है.

शनि देव सेवा के भी अधिकारी हैं इसलिए इनका प्रभाव होने से मेहनत और लगन से कार्य करने की प्रेरणा मिलती है. शनि व्यक्ति को कर्तव्यनिष्ठ भी बनाता है. शनि प्रभावित व्यक्ति अधिकार मांगने की बजाय कर्तव्य पालन में अधिक विश्वास रखते हैं. शनि महाराज सभी को कर्म की प्रेरणा देते हैं. शनि का जिनपर आशीर्वाद होता है वह अपने लक्ष्यों (aim) को लेकर सजग रहते हैं और कार्य में सफलता के लिए अधिक मेहनत भी करते हैं. “सादा जीवन उच्च विचार” वाली बातें शनि प्रभावित व्यक्ति में पाया जाता है.

कुण्डली में शनि देव अष्टम भाव के कारक ग्रह होने के कारण इनका मृत्यु से संबन्ध बताया गया है. शनि देव के सामान्य गुणों में निरन्तर काम में लगे रहने की प्रवृति मुख्य रुप से पाई जाती है. शनि के प्रभाव क्षेत्रों में आने वाले व्यक्तियों को उच्च पद पाने में सदैव ही दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. अपने कार्य के प्रति ईमानदार (honesty towards wortk) रहने का गुण शनि देव के प्रभाव से ही आता है. इसके अलावा कार्यो में निष्ठा का गुण भी देखा जाता है. शनि देव को न्याय करने में कठोर कहा गया है.

शनि देव के गुण: (Qualities of Shani Deva as per KP System)

शनि देव के गुणों के कारण व्यक्ति में कार्य के प्रति समर्पण पाया जाता है. इस ग्रह से प्रभावित व्यक्तियों के स्वभाव में भोग-विलास के विषयों से अलग रहने की प्रवृति पाई जाती है. कार्यो व निर्णयों में दूरदर्शिता का गुण भी मुख्य रुप से पाया जाता है. कभी-कभी इनमें आलस का गुण भी पाया जाता है. कुण्डली में शनि पर अशुभ प्रभाव होने पर व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता गुण पाया जाता है. इस स्थिति में व्यक्ति के स्वभाव में आशावादिता की कमी पायी जाती है.

शनि शरीर के अंगों में: (Placement of Saturn in the Different Organs of a Body as per KP System)

कालपुरूष की कुण्डली में शनि की राशि दशम भाव व एकादश भाव में आती है. इसलिये शरीर के अंगों में घुटने व पिंडलियों को शनि देव के प्रभाव क्षेत्र में माना जाता है. शरीर के जोड़ों और हड्डियों पर भी शनि की सत्ता मानी जाती है.

शनि की बीमारियों में : (Disease Occur by Saturn as per KP System)

शनि देव पर किसी प्रकार का कोई अशुभ प्रभाव होने पर शनि संबन्धी रोग होने की संभावना रहती है. शनि देव घुटनों की बीमारियां दे सकते है. पिण्डलियों में दर्द रहने की शिकायत भी शनि देव की नाराजगी से हो सकता है. चन्द्र व शनि की युति पर अशुभ प्रभाव व्यक्ति को निराशावादी बना सकती है. शनि देव हड्डियों के कारक ग्रह होने के कारण दांतों में परेशानियां भी दे सकते है.

किसी भी प्रकार का जोडों में दर्द शनि देव के प्रभाव से हो सकता है. शनि देव के मन्द गति ग्रह होने के कारण इनके प्रभाव से लम्बी अवधि के रोग होने की संभावना रहती है. शरीर में कैल्शियम की कमी से होने वाली बीमारियां भी शनि के प्रभाव से होती है.

शनि के कार्यक्षेत्र: (Working Areas of Saturn as per KP System)

आजीविका क्षेत्रों में जानवरों की मृत्यु के बाद प्रयोग में आने वाले चमडे से संबन्धित कार्यो को इसके कार्यक्षेत्रों में रखा जाता है. शनि के कार्यक्षेत्रों में इंजीनियरिंग, संग्रहालय, एयर कंडीशनर का काम करने वाले व्यक्ति, प्राचीन परम्परावादी कार्य, आजीविका, जासूसी, ज्योतिषशास्त्र, तंत्र-मंत्र आदि का काम करने वाले व्यक्ति की आजीविका शनिदेव के कार्य क्षेत्र से जुड़ी होती है. शनि न्यायकर्ता है. न्याय के देवता होने के कारण वकील तथा अदालत में वकील के कार्य भी आते है. अदालतों में न्याय के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों पर शनि का प्रभाव होता है.

शनि के व्यवसायिक क्षेत्र (Business Related to Saturn as per KP System)

चमडे के बैगों का निर्माण करने वाले, जूतों के निर्माता, स्वेटर, शालें, मोजे इत्यादि वस्तुएं तथा हड्डियों से बनने वाली वस्तुएं, आइसक्रीम, फ्रिज इत्यादि वस्तुओं को शनि के व्यवसायिक क्षेत्रों में रखा गया है. उपरोक्त सभी वस्तुओं का निर्माण व विक्रय शनि प्रभावित कार्य क्षेत्र में आता है. लोहे एवं स्टील धातु से जुड़े सभी उद्योग भी शनि के प्रभाव क्षेत्र में आते है. लोहे की छोटी-छोटी वस्तुओं से लेकर बड़े-बड़े जहाजों तक सभी पर शनि देव आधिपत्य रहता है. मजदूर, सेवक, उतम श्रेणी के इंजीनियर इन सभी का काम शनि की आजीविका क्षेत्र में आता है.

शनि के स्थान: (Place of Saturn as per KP System)

शनि एकान्त पसन्द ग्रह है. इसलिये सुनसान क्षेत्र व घने जंगलों, निर्जन स्थानों को शनि देव का स्थान समझा जाता है. गंदे तथा अधेरे स्थानों को भी शनि का स्थान माना जाता है. श्मशान व सभी उंचे व ठंडे स्थानों पर शनि देव का अधिकार होता है.

शनि संबन्धी पशु व पेड-पौधे: (Animals and Plants of Saturn as per KP System)

चूहे, छिपकली, छिलकेवाले स्वादहीन फल, सुपारी, करेला आदि पर शनि का स्वामित्व होता है. प्राचीन वृक्षों को भी शनि का स्वरुप माना जाता है.